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Category: Arts

21 Shakespeare Quotes

1. “Wild Goose Chase” // Romeo and Juliet, Act II, Scene IV 2. “Green-Eyed Monster” // Othello, Act III, Scene III 3. “Pure as the Driven Snow” // Hamlet, Act III, Scene I and The Winter’s Tale, Act IV, Scene IV 4. “Seen Better Days” // As You Like It, Act II, Scene VII 5. “Off With His Head” // Richard […]

Kya Karu (#harivanshRaiBachchan)

मैं दुखी जब-जब हुआ संवेदना तुमने दिखाई, मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा, रीति दोनो ने निभाई, किन्तु इस आभार का अब हो उठा है बोझ भारी; क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी? क्या करूँ? एक भी उच्छ्वास मेरा हो सका किस दिन तुम्हारा? उस नयन से बह सकी कब इस नयन की अश्रु-धारा? सत्य को मूंदे रहेगी […]

Jina Dubhar Ho Jayega (शिवमंगलसिंहसुमन)

जो भी आया था जीवन में यदि चला गया तो रोना क्‍या? ढलती दुनिया के दानों में सुधियों के तार पिरोना क्‍या? जीवन में काम हजारों हैं मन रम जाए तो क्‍या कहना! दौड़-धूप के बीच एक-क्षण, थम जाए तो क्‍या कहना! कुछ खाली खाली होगा ही जिसमें निश्‍वास समाया था उससे ही सारा झगड़ा […]

Juhi Ne Pyar Kiya Shatdal Se (जूही ने प्यार किया शतदल से! #BhawaniPrasadMishra)

जूही ने प्यार किया शतदल से! दोनों के लोक दो, शोक किन्तु एक हुए दोनों के सन्ध्या के झुरमुट से मानो निहारा और अश्रु चुए दोनों के धरती पर इसके अश्रु, पानी पर उसके चुए दोनों के लोक दो, शोक किन्तु एक हुए। जूही का क्या होगा धरती ने पूछा जल से! जूही ने प्यार […]

Ye Jo Shehtir Hai (#दुष्यंत #येजोशहतीर_है)

परदे हटाकर करीने से रोशनदान खोलकर कमरे का फर्नीचर सजाकर और स्वागत के शब्दों को तोलकर टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ और देखता रहता हूँ मैं। सिर्फ़ कल्पनाओं से सूखी और बंजर ज़मीन को खरोंचता हूँ जन्म लिया करता है जो ऐसे हालात में उनके बारे में सोचता हूँ कितनी अजीब बात है कि […]

Rashmirathi snippet (#दिनकर #रश्मिरथी #चतुर्थ_सर्ग)

जो नर आत्म-दान से अपना जीवन-घट भरता है, वही मृत्यु के मुख मे भी पड़कर न कभी मरता है। जहाँ कहीं है ज्योति जगत में, जहाँ कहीं उजियाला, वहाँ खड़ा है कोई अंतिम मोल चुकानेवाला। व्रत का अंतिम मोल राम ने दिया, त्याग सीता को, जीवन की संगिनी, प्राण की मणि को, सुपुनीता को। दिया […]

jizya (परवीन_शाकिर)

गुड़िया-सी ये लड़की जिसकी उजली हँसी से मेरा आँगन दमक रहा है कल जब सात समंदर पार चली जाएगी और साहिली शहर के सुर्ख़ छतों वाले घर के अंदर पूरे चाँद की रोशनी बनकर बिखरेगी हम सब इसको याद करेंगे और अपने अश्कों के सच्चे मोतियों से सारी उम्र इक ऐसा सूद उतारते जाएँगे जिसका […]

विरोध

मुझको डर लगता है, मैं भी तो सफलता के चंद्र की छाया में घुग्घू या सियार या भूत नहीं कहीं बन जाऊँ। उनको डर लगता है, आशंका होती है कि हम भी जब हुए भूत घुग्घू या सियार बने तो अभी तक यही व्यक्ति ज़िंदा क्यों? उसकी वह विक्षोभी संपीड़ित आत्मा फिर जीवित क्यों रहती […]

पिता जैसा होना

चाय पीते हुए मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ अच्छी बात नहीं है पिताओं के बारे में सोचना अपनी कलई खुल जाती है कितनी दूर जाना होता है पिता से पिता जैसा होने के लिये #अज्ञेय

कमरे में धूप / कुंवर नारायण

हवा और दरवाज़ों में बहस होती रही, दीवारें सुनती रहीं। धूप चुपचाप एक कुरसी पर बैठी किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही। सहसा किसी बात पर बिगड़ कर हवा ने दरवाज़े को तड़ से एक थप्पड़ जड़ दिया! खिड़कियाँ गरज उठीं, अख़बार उठ कर खड़ा हो गया, किताबें मुँह बाये देखती रहीं, पानी से […]

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